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Chapter 1 - Unnamed

राजा भोज की कहानी {पाठ=1 }

इतिहास में कुछ नाम ऐसे भी हुए हैं ।जिन्हें समय भी नहीं मिटा सका यह कहानी है। मालवा के उस पवित्र मिट्टी के जहां किलो की दीवार वीरों के खून से रंगी

थ। यह कहानी है उस राजा की जो तलवार उठना तो बड़े-बड़े दुश्मन कम जाते कलम चलती तो बड़े-बड़े विद्वान नतमस्तक हो जाते कहानी है प्रमाण वंश के महाप्रतापी राजा भोज की जिनके लिए सिंहासन का

सफर फूलों से नहीं बल्कि कांटों से सजा थ। ऐसे कटे जो उनके अपने ही परिवार वालों ने बिछाए थे ।जब भोज मात्र 11 वर्ष के थे। कई मुश्किलों का सामना किया पर सवाल यहां है ।कि राजा भोज

आखिर कौन थ। क्या वे सिर्फ एक वीर योद्धा थे ।या एक ऐसे विद्वान जिनके सामने बड़े-बड़े आचार्य भी नतमस्तक हो जाते थ। क्या रहस्य है इनका जो राजा

भोज को अमर बना दिया 10वीं शताब्दी का अंत मध्य भारत का मालवा क्षेत्र राजनीति, युद्ध और संस्कृति तीनों का केंद्र बन चुका था। प्रमाण वंश उस समय मालवा पर शासन कर रहा था। जिनकी राजधानी ''थार'' थी ।इसी प्रमाण वश में 980 ई के

आसपास एक बालक ने जन्म लिया। जिनका नाम रखा गया भोज जो प्रमाण राजा सिंदूराज का पुत्र था। और उनकी माता का नाम सावित्री बताया जाता है ।उस समय किसी ने नहीं सोचा था। कि वही बालक आगे चलकर मालवा ही नहीं बल्कि पूरे

भारत के इतिहास में अमर हो जाएग। भोज का बचपन एक राजकुमार की तरह प्रारंभ हुआ जहां शस्र और शास्त्र दोनों की शिक्षा दी गई। संस्कृत ,राजनीति ,युद्ध कला और धर्म इन सभी विषयों में बालक भोज साधारण प्रतिभा दिखा रहे थे। भोज बचपन से ही काफी ज्यादा बुद्धिमान थे ।

और उनका बचपन सुखद बीत रहा था ।लेकिन यह सुख ज्यादा दिन नहीं चला लगभग 991 ई के आसपास जब भोज केवल 13 वर्ष के थे ।तब उनके पिता राजा सिंधु राज की मृत्यु हो गई ।और मालवा

के सट्टा का संतुलन बिगड़ने लगा गद्दी पर बैठे राजा सिंधु राज के छोटे भाई और भोज के चाचा राजा मूंछ ने शासन संभाल लिया ।और यही से इतिहास करवट लेता है ।राजा मुंज एक शक्तिशाली महत्वाकांक्षी शासक थे ।उनके मन में यहां भय जग

रहा थ। कि कल को भोज गद्दी पर बैठ सकता है ।और इसी डर ने उनके मन में एक घटक विचार भर दिया भोज को रास्ते से हटाने के लिए अपने विश्वास पात्र सेनापति वत्सराज को चुना उसने वत्स राज को आदेश दिया। कि वह भोज को जंगल में ले जाए

और चुपचाप किसी को बिना पता चल मार दिया ।जाए और वहां जंगल की ओर चल पड़े पर भोज बुद्धिमान थे। वह समझ गए कि उनके साथ क्या होने वाला ह। तभी उन्होंने अपनी जान से खून निकल कर एक पत्ते पर संस्कृत में एक श्लोक लिखा

और वत्सराज को कहा कि राजा मूछ को दे देना ।वत्सराज ने वह श्लोक को देख कर चकित रह गए ।और उसने जाकर राजा मूछ को दे दिया वह देखते ही राजा मूंछ के होश उड़ गए आज तक किसी को नहीं पता कि उसमें क्या लिखा था पर माना जाता है ।कि उस श्लोक को पढ़कर राजा मूंछ का हृदय

परिवर्तन हो गया। उसने तुरंत भोज को बुलाकर उसे अपना उतरा अधिकारी बना दिय। लेकिन यहां तो बस शुरुआत थी असली परीक्षा असली युद्ध असलीइतिहास बाकी था। और यही से शुरू होती है उस राजा की कहानी लेकिन उसके असली

इतिहास जाने से पहले हम यह जान लेते हैं कहां ''राजा भोज'' और कहां ''गंगू तेली ''इस कहावत के पीछे बहुत बड़ा रहस्य है ।लगभग 1010 ई के आसपास मालवा का राजा बना लिया जाता लोक कथाओं के अनुसार राजा भोज एक न्याय प्रिय और दयालु राजा थे। वह प्रजा से अत्यधिक प्रेम करते थे

और प्रजा भी उनका प्रेम करती थी। राजा भोज जब रात में वेश बदलकर अपने राज्य में घूमते थे । ताकि प्रजा के दुःख सुख जान सके और एक रात जब वह एक ब्राह्मण पति पत्नी के झोपड़े के पास से गुजर

रहे थे। तब उन्होंने बातें करते सुना ब्राह्मण अपनी पत्नी से कह रहा थ। कि वहां अब काम नहीं कर सकता है वहां बुड्ढा और कमजोर हो चुका है ।अब वह इजमानो के घर जाकर पूजा पाठ नहीं कर

सकता है ।इस पर ब्राह्मणी ने कहा तो फिर हमारा घर कैसे चलेग। हमारा तो कोई पुत्र भी नहीं है ।इस पर ब्राह्मण चिंतित हो गया और कहां की अब राजा भोज ही कुछ कर सकते हैं। अगले दिन वहां ब्राह्मण राजा भोज के दरबार में पहुंच गया राजा को प्रणाम

करते हुए ।उन्हें सारी बातें बताई राजा यहां सब पहले से ही जानते थे ।इसलिए उन्होंने ब्राह्मण को 100 सोने के सिक्के दिए दान में ताकि वहां अपना जीवन यापन कर सके इस से ब्राह्मण अत्यधिक खुश हुआ थ। लेकिन इतनी ज्यादा सिक्कों से वहां

अपने बाकी जीवन खुशी से बिता सकता था। और अपने सारे रोजमर्रा की जरूरत को पूरा कर सकता थ। यह खुशखबरी घर आकर अपनी पत्नी को भी बताई दोनों काफी खुश थे। और रात में सोनी से पहले उस सिक्कों को एक बक्से में रख दिया ।जब वे सुबह उठे तो देखा कि सिक्के गायब थे ।यहां देख

कर ब्राह्मण चौक गया। उसने घबराकर यह सारी बात जाकर राजा भोज को बताई राजा भोज भी चौंक गए राजा भोज ने उसे ब्राह्मण को फिर 100 सोने के सिक्के उपहार में दिए ब्राह्मण फिर से खुशी-खुशी अपने घर को जल दिए ।और रात में सोने से

पहले फिर से उन सिक्कों को संदूक में रख दिया। और इस बार ताला अच्छे से लगा दिया। फिर रात में अचानक उनके घर राजा भोज आए और उन्होंने ब्राह्मण से कहा ब्राह्मण देवता हमारा राज्य संकट में ह। एक बड़ी विपदा आ पड़ी है। इसलिए आप मुझे

वे 100 सिक्के वापस कर दीजिए ।अभी हमारे राज्य को इसकीआवश्यकता है यह बात सुनकर ब्राह्मण ने राजा भोज को वे सारे सोने के सिक्के वापस दे दिए। और सो गया जब सुबह उसकी नींद खुली तो वह सिक्के संदूक से गायब थे। और जब

वहां सारी बात ब्राह्मणी को बताया कि सिक्के तो राजा भोज ले गए। तब उनकी पत्नी ने कहा ऐसा कैसे हो सकता है। हमारे यहां तो रात में कोई नहीं आया जरूर वहां भैरुपिया होगा या आपने कोई बुरा सपना देखा होगा फिर दुखी ब्राह्मण ने यह सारी बातें जाकर राजा भोज को बताई

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