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Chapter 1 - chapter-1 “छाया”

🖤 Chapter 1

"छाया"

रात के साढ़े दस बजे थे।

शहर की सड़कें लगभग खाली थीं।

हल्की बारिश हो रही थी।

स्ट्रीट लाइट की पीली रोशनी सड़क पर टूट रही थी।

आरोही ने अपना बैग कंधे पर ठीक किया और तेज़ कदमों से आगे बढ़ी।

उसे आज फिर वही खबर मिली थी।

एक और लड़की गायब।

तीन महीने में सातवीं।

"ये शहर शांत नहीं है…" उसने खुद से बुदबुदाया।

उसका फोन वाइब्रेट हुआ।

Unknown number।

वो रुकी नहीं।

चलते-चलते कॉल उठाया।

"आरोही मेहता?"

आवाज़ धीमी थी… लेकिन साफ़।

"कौन?"

कुछ सेकंड चुप्पी।

फिर—

"जो कर रही हो, बंद कर दो।"

उसका दिल तेज़ धड़कने लगा।

"तुम कौन हो?"

"सवाल मत पूछो। बस इस केस से दूर रहो।"

कॉल कट।

आरोही ने गहरी साँस ली।

ये पहली धमकी नहीं थी।

लेकिन इस बार आवाज़… अजीब थी।

डराने वाली नहीं।

जैसे… चेतावनी हो।

वो मुड़ी।

सड़क खाली।

लेकिन उसे महसूस हुआ — कोई है।

पीछे।

धीरे-धीरे।

उसने कदम तेज़ कर दिए।

बारिश थोड़ी तेज़ हो गई।

दिल की धड़कन कानों में गूंज रही थी।

फिर…

कदमों की आहट।

स्पष्ट।

अब उसे यकीन था — कोई उसका पीछा कर रहा है।

वो अचानक रुकी।

मुड़ी।

और उसे देखा।

काले कपड़े।

लंबा कद।

चेहरा आधा अंधेरे में।

आँखें… बस आँखें साफ़ दिख रही थीं।

गहरी।

ठंडी।

और अजीब तरह से शांत।

"तुम मेरा पीछा क्यों कर रहे हो?"

आरोही की आवाज़ काँपी नहीं।

वो डर रही थी… पर दिखाना नहीं चाहती थी।

वो आदमी दो कदम आगे आया।

"मैं तुम्हारा पीछा नहीं कर रहा।"

"तो क्या? यूँ ही घूम रहे हो?"

उसकी नज़रें उस पर टिकी रहीं।

"तुम्हें अंदाज़ा नहीं है तुम किसमें हाथ डाल रही हो।"

"मुझे डराने आए हो?"

"अगर डराना होता… तो अभी तक तुम घर नहीं पहुँचती।"

एक सेकंड के लिए दोनों के बीच सिर्फ बारिश की आवाज़ थी।

आरोही ने उसे गौर से देखा।

वो अपराधी जैसा दिखता नहीं था।

लेकिन शरीफ भी नहीं।

"नाम क्या है तुम्हारा?"

वो हल्का सा मुस्कुराया।

"नाम जानकर क्या करोगी?"

"Report लिखूँगी।"

उसने पहली बार उसकी आँखों में कुछ बदला हुआ देखा।

जैसे उसे ये जवाब पसंद आया।

"रुद्र।"

आरोही का दिल एक अजीब लय में धड़का।

"ठीक है, रुद्र।

अगर तुम्हें कुछ पता है… तो बताओ।"

वो करीब आया।

इतना करीब कि उसकी खुशबू महसूस हो रही थी — धुएँ और बारिश की मिली-जुली।

"तुम्हें सच चाहिए?"

"हाँ।"

उसने झुककर उसके कान के पास कहा—

"तो पीछे मुड़कर मत देखना।"

आरोही की सांस अटक गई।

"मतलब?"

रुद्र पीछे हट गया।

"अभी घर जाओ।"

"तुम मुझे आदेश दे रहे हो?"

"नहीं। बचा रहा हूँ।"

इतना कहकर वो मुड़ा… और अंधेरे में खो गया।

आरोही वहीं खड़ी रह गई।

दिल धड़क रहा था।

डर भी था।

लेकिन…

उससे ज्यादा कुछ और था।

जिज्ञासा।

और एक अजीब खिंचाव।

उसने आखिरी बार पीछे देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन उसे महसूस हुआ—

ये कहानी अभी शुरू हुई है।

और शायद…

वो अब अकेली नहीं है।

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