WebNovels

Chapter 1 - Unnamed

आज से करीबन 20 साल पहले मेरे घर की स्थिति बहुत ही नाजुक हो गई थी उसे टाइम पर बेटियों की शादी में दहेज लगता था मेरे घर की हालत ठीक ना होने के कारण मेरी शादी एक ऐसे व्यक्ति सेकराई गई जो मुझे समझने में असमर्थ था ना ही मेरी जरूरत को समझता था और ना ही मुझे और दहेज न देने के कारण मेरे ससुराल वालों ने भी मुझे पीड़ित किया कुछ सालों बाद मेरी एक बेटी हुई मुझे लगा कि शायद इसके बाद मेरे ससुराल वाले मुझे समझेंगे इसी आशा में मैं सब कुछ चुपचाप सकती रही कुछ समय बाद फिर मेरी एक और बेटी हुई जब दूसरी बेटी हुई तो मेरे ससुराल में मेरी कीमत और घाटी चली गई क्योंकि उन्हें तो एक पुत्र लालसा थी सभी के इस व्यवहार को देखकर मैंने सोचा कि शायद इस बार लड़का हो जाएगा और कुछ समय बाद फिर से मेरी एक और बेटी हुई भगवान ने यह मुझे कैसी नियति दिखलाई थी तीसरी बेटी का एक पर उल्टा था इसी कारण सभी मुझे और भी नफरत करने लगे जब यह सब मेरे लिए असहनीय हो गया तब मेरा मन मुझे एक ऐसी दिशा की ओर ले गया जहां शायद कोई भी नहीं जाना चाहेगा पर मेरे परिवार की नफरत में मुझे इतना परेशान कर दिया था कि मुझे कुछ भी सही और गलत समझ नहीं आ रहा था तभी मैंने एक ऐसे दूसरे जीवनसाथी की तलाश की जो मुझे और मेरी बच्चियों को समझ सके और फिर मैं मेरी छोटी बेटी जो की पर से अपाहिज थी उसे अपने साथ लेकर अपने दूसरे पति के साथ रहने लगी उन्होंने मुझे यह दिलासा दिया था कि वह मेरी तीनों बेटियों को खुश रखेंगे और मेरी बड़ी और छोटी बेटी को भी ले आएंगे कुछ दिन तक तो वह ठीक रहे जब मैंने कहा कि मेरी बाकी दोनों बेटियों को आप कब लेंगे तो उन्होंने मुझे कह दिया कि मैं और दो का बोझ नहीं उठा पाऊंगा यह सुनकर मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई इसी तरह फिर उनका व्यवहार मेरे प्रति बदलने लगा कुछ दिनों बाद मुझे एक पुत्र की प्राप्ति हुई फिर उन्होंने मुझे गांव में ही छोड़कर बाहर काम करने चले गए धीरे-धीरे मुझे यह एहसास हुआ कीमुझे कितनी बड़ी गलती हुई है पर अब ना मैं यहां से जा सकती थी और ना ही अपनी मां से मदद मांग सकती थी फिर कुछ समय बाद मेरी मां और भाई को लगा कि मैं खुश रह रही हूं और मैंने जो भी किया अपनी खुशी के लिए किया उन्हें इस बात की भनक बिल्कुल नहीं थी कि मैं यहां किस स्थिति में जीवन व्यतीत कर रही हूं मेरी मां और भाई ने मेरी गलती को माफ कर दिय और मुझे फिर से अपना लिया अब मैं अपने मायके भी घूमने जाने लगी थी और मेरी दोनों बेटियां भी वहां मुझसे मिलने आने लगी थी फिर कुछ समय बाद मेरे पति ने पैसे कमाना छोड़ दिया घर बैठे रहे और शराब की लत ने उन्हें रास्ते पर लाकर खड़ा कर दिया मैं अपने दोनों बच्चों का पेट कैसे भरूं यह सोचकर मैंने अपने पति से कहा कि मुझे कहीं रूम दिला दो में ही कुछ काम करुंगी और अपने बच्चों का पेट भरूंगी पर उन्होंने मेरा साथ नहीं दिया इस कारण से मैंने अपने बच्चों के साथ अकेले रहने का फैसला किया पर मुझे मेरे पति जाने नहीं देरहे थे भगवान ने मुझे फिर से इस दौरे पर लाकर खड़ा कर दिया जहां से मैं कुछ सालों पहले भाग कर आई थी अब ना ही मेरे पास पैसा था और ना ही सहारा मैं एक बार फिर अकेली हो गई इसी तरह अपने जीवन में संघर्ष करते-करते मैंने अपने कीमती वक्त को खो दिया मेरी छोटी बेटी का पर भगवान की कृपा से बिल्कुल ठीक हो गया और वह अब बड़ी हो गई थी मेरा बेटा भी बड़ा हो गया था मेरा बेटा अपने पिता के साथ रहकर बहुत गलत आदतें सीख रहा था इन सबको देखकर मैंने यह फैसला लिया कि मैं अपने पति से दूर रहकर खुद मेहनत करके अपने बच्चे की परवरिश करूंगी अपना और अपने बच्चों का पेट भी भरूंगी यही सोच कर मैं अपनी जिंदगी की नहीं शुरुआत करने जा रही हूं अब तो मैं भी नहीं जानती कि भगवान और कितनी परीक्षा लेंगे मेरी पर मैंने यह निर्णय लिया कि मैं प्रभु की सारी परीक्षाओं में पास होकर दिखाऊंगी और फिर मैं यह निश्चय किया कि चाहे जो हो जाए अब मैं खुद ही अपना जीवन अपने बच्चों का जीवन सुधारुंगी

यह कहानी सिर्फ मेरी ही नहीं यह हर उसे औरत की है जो कभी अपने पति से परेशान तो कभी अपने ससुराल वालों से परेशान एक औरत को जिंदगी में लोग इतना परेशान करते हैं कि वह औरत यह सोचने लगती है कि क्या उसकी औरत होना शुरू में एक औरत को लक्ष्मी कहा जाता है और उसे ही लक्ष्मी देकर भेजा कर दिया जाता है एक औरत को अन्नपूर्णा कहा जाता है और उसे ही सबसे आखरी में खाना मिलता है एक औरत को सरस्वती कहा जाता है और उसी से शिक्षा छीन ली जाती है अब क्या होगा मेरे साथ यह तो मैं खुद भी नहीं जानती पर इतना जरूर जानती हूं कि अब मैं हार नहीं मानूंगी आप अपनी लड़ाई में खुद लडूंगी और इसमें जीत कर भी दिखाऊंगी

धन्यवाद!

More Chapters