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Chapter 1 - पहला प्यार और पहला धोखा

यह बात है लगभग आज से 7 साल पहले की लगभग 2018 की जब मैं अपना ग्रेजुएशन कंप्लीट करके बीटीसी करने के लिए कॉलेज में एडमिशन लेता हूं वहां जाने के बाद मेरी मुलाकात होती है एक लड़की से जिसका नाम होता है जिसको देखते ही मुझे अपने फर्स्ट अट्रैक्शन हो जाता है उसे और मैं पहले दिन दिन से ही हम दोनों के बीच में एक अट्रैक्शन आता है तो अट्रैक्शन के साथ ही हम दोनों के मन में दूसरे के लिए कहीं ना कहीं फीलिंग से भी आने लगते हैं धीरे-धीरे समय बीतता है हम दोनों एक दूसरे के पास आने लगते हैं कुछ समय बाद ऐसा होता है कि पूरे कॉलेज में हम दोनों के ही चर्चा होने लगते हैं हम दोनों के प्यार को एक नया नाम दिया जाता है उसे मेरे नाम से लोग कॉलेज में जानते हैं मुझे मानवी बुलाने लगते हैं और इसी तरह से हम लोगों के दिन बीतने लगते हैं हम दोनों को प्यार मोहब्बत सब होने लगता है फिर एक टाइम ऐसा आता है कि एक दिन में कहीं जा रहा होता हूं तो और मेरा रास्ते में एक्सीडेंट हो जाता है और एक्सीडेंट के कारण मेरे दोनों पर कट जाते हैं और मेरे पैर काटने के बाद भी मैं सबसे मेरे दिमाग में बस एक ही बात चल रही होती है कि मैं अब अपनी मानवी के आगे कैसे जाऊंगा उसे कैसे अपना मुंह दिखाऊंगा मै दर्द में हूं फिर भी प्यार ही चल रहा होता मैं कुछ भी सोच नहीं पाता हूं मेरे दर्द से ज्यादा मुझे उसकी याद आ रही है लेकिन फिर बेहोश हो जाता हूं और फिर लोग मुझे लेकर अस्पताल लेकर जाते मेरे दोस्त लोग वहां एडमिट करते हैं कोई इलाज चलता है जब मुझे होश आता है तो मेरे मन में सबसे पहले उसी की याद आती है मैं सबसे पहले अपने दोस्तों से पूछता हूं मानवी कहां है तो मेरे दोस्त मुझे बताते हैं वह तो मुझे छोड़कर जाने कब का जा चुकी जिस दिन मेरा एक्सीडेंट हुआ था उसी दिन उसने मुझे छोड़ दिया था वह किसी और के साथ जा चुकी थी यह सुनकर मेरी पैरों तले की जमीन की खिसक जाती है कि जिस लड़की से मैं इतना प्यार किया था वह आज मेरा बुरा दिन आने पर मुझे छोड़ कर चली गई मैं वहीं अस्पताल में बैठ पड़ा आंखों से आंसू बहा रहा हूं मुझे कुछ देर तक समझ ही नहीं आया कि मेरे साथ हुआ क्या है।

जिस लड़की के लिए मैंने अपने सपनों को नाम दिया था,

जिसे देखकर हर सुबह कॉलेज जाना आसान लगता था,

आज वही लड़की मेरे सबसे बुरे वक्त में मेरा हाथ छोड़ चुकी थी।

अस्पताल का वो कमरा अचानक बहुत छोटा लगने लगा।

चारों तरफ़ लोग थे, लेकिन फिर भी मैं अकेला था।

मेरे पैर ज़ख्मी थे, शरीर दर्द से भरा था,

लेकिन सबसे गहरा ज़ख्म दिल में था।

मैं बार-बार खुद से यही पूछ रहा था—

"क्या मेरा प्यार इतना कमज़ोर था?"

"या फिर मैं ही उसकी ज़िंदगी का बस एक टाइम-पास था?"

आँखों से आँसू अपने आप बहते जा रहे थे।

ना किसी से बात करने का मन था,

ना किसी को देखने का।

कुछ दिन अस्पताल में ऐसे ही बीत गए।

दोस्त आते थे, समझाते थे—

"भाई, जो चला गया वो अपना नहीं था।"

लेकिन उस वक्त ये बातें ज़हर जैसी लगती थीं।

डिस्चार्ज होने के बाद जब मैं घर लौटा,

तो पूरा घर शांत था…

माँ की आँखों में चिंता थी,

पिता की चुप्पी में हज़ार सवाल।

मैं कमरे में बंद हो गया।

दिन-रात बस उसी की यादें आतीं—

कॉलेज के वो गलियारे,

उसकी हँसी,

उसका नाम "मानवी"…

जो अब सिर्फ़ एक याद बन चुका था।

कई रातें ऐसी गईं जब नींद नहीं आई।

तकिए को भिगोते हुए खुद से एक ही सवाल पूछता रहा—

"अगर प्यार सच्चा था, तो वो गई कैसे?"

धीरे-धीरे वक्त ने मुझे एक बात सिखाई—

जो साथ सिर्फ़ अच्छे वक्त में दे,

वो प्यार नहीं, मजबूरी होता है।

मैंने खुद से वादा किया—

अब किसी के लिए नहीं,

अपने लिए जीना है।

शरीर ठीक होने में समय लगा,

लेकिन उस धोखे ने मुझे अंदर से

पहले से कहीं ज़्यादा मजबूत बना दिया।

कॉलेज वापस गया तो लोग आज भी बातें करते थे,

लेकिन अब नाम के साथ दर्द नहीं था,

बस एक सीख थी।

मैं समझ गया था—

कुछ लोग हमारी ज़िंदगी में

साथ चलने नहीं,

हमें मजबूत बनाने आते हैं।

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