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Chapter 1 - College day's

📖 करिश्मा की ज़िंदगी

(पहाड़ी ग्रामीण जीवन पर आधारित वेब नॉवेल)

अध्याय – 1 : पहाड़, मैं और मेरी साँसें

पहाड़ की सुबह किसी कविता की तरह होती है—

धीमी, शांत और सच्ची।

जब बाकी दुनिया अलार्म से जागती है,

तब पहाड़ चिड़ियों की आवाज़ और देवदार के पेड़ों से फिसलती हवा से जागते हैं।

करिश्मा की आँखें भी हर रोज़ इसी हवा के स्पर्श से खुलती थीं।

मिट्टी से लिपा छोटा सा घर,

टीन की छत जिस पर रात की ओस अब भी ठहरी थी,

और सामने दूर-दूर तक फैली पहाड़ियाँ—

यही उसकी पूरी दुनिया थी।

करिश्मा ने रजाई समेटी और बाहर आंगन में कदम रखा।

नंगे पाँव मिट्टी की ठंडक उसके भीतर उतर गई।

उसने गहरी साँस ली—

यह साँस शहर की नहीं थी,

यह पहाड़ की साँस थी।

माँ, चूल्हा और ज़िम्मेदारियाँ

रसोई से धुएँ की हल्की लकीर उठ रही थी।

माँ मिट्टी के चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी।

"उठ गई?"

माँ की आवाज़ में प्यार भी था और थकान भी।

"हाँ माँ।"

करिश्मा जानती थी,

इस घर में हर किसी की सुबह

काम से शुरू होती है।

उसने गागर उठाई,

घसियारी की रस्सी कंधे पर डाली

और पानी के लिए नीचे धारे की ओर चल पड़ी।

रास्ता आसान नहीं था—

पत्थर, ढलान, और फिसलन।

पर करिश्मा के कदमों को अब इनसे डर नहीं लगता था।

जैसे-जैसे वह बड़ी हो रही थी,

वैसे-वैसे रास्ते उसके पैरों को पहचानने लगे थे।

पिता और खालीपन

पिता शहर में थे—

"कमाने गए हैं"

यही वाक्य सालों से सुनती आ रही थी।

शुरू में हर हफ्ते फोन आता,

फिर महीने में,

और अब—

कभी-कभी।

माँ कभी कुछ नहीं कहती,

पर उसकी चुप्पी बहुत कुछ कह जाती थी।

करिश्मा सोचती—

क्या शहर आदमी को इतना थका देता है

कि वह अपने घर को भी भूल जाए?

स्कूल और सपने

स्कूल जाने का रास्ता सबसे लंबा था,

पर सबसे प्यारा भी।

रास्ते में बुरांश के पेड़ खिले रहते,

और बच्चे हँसते-बोलते चलते।

करिश्मा पढ़ना चाहती थी।

वह किताबों में खुद को ढूँढती थी।

जब टीचर किसी बड़े शहर की बात करते,

तो उसकी आँखों में चमक आ जाती।

लेकिन गाँव में

लड़कियों के सपनों को

अक्सर "ज़रूरत से ज़्यादा" कहा जाता है।

"लड़की को इतना पढ़ा-लिखा कर क्या करना है?"

"आख़िर जाना तो ससुराल ही है।"

ये बातें उसने कई बार सुनी थीं।

हर बार चुप रही,

पर हर बार उसके भीतर कुछ टूटता गया।

गाँव की बातें और ताने

गाँव छोटा था,

और बातें बड़ी तेज़ी से फैलती थीं।

कोई कहता—

"लड़की ज़्यादा बाहर रहती है।"

कोई कहता—

"आजकल की लड़कियाँ पढ़-लिख कर बिगड़ जाती हैं।"

करिश्मा जानती थी—

यह पहाड़ जितना सुंदर है,

उतना ही सख्त भी।

माँ से बातचीत

एक शाम,

जब सूरज पहाड़ों के पीछे छिप रहा था,

करिश्मा माँ के पास बैठ गई।

"माँ…

अगर मैं आगे पढ़ना चाहूँ तो?"

माँ चुप हो गई।

चूल्हे की आग तेज़ हो गई,

जैसे सवाल सुनकर जल उठी हो।

"बिटिया,

मेरी इच्छा तो है…

पर हालात…"

माँ की आँखों में नमी थी।

करिश्मा ने पहली बार समझा—

गरीबी सिर्फ़ पैसों की नहीं होती,

वह सपनों की भी होती है।

पहाड़ से बात

उस रात करिश्मा देर तक जागती रही।

बाहर चाँदनी फैली थी।

पहाड़ चुपचाप खड़े थे,

जैसे सुन रहे हों।

उसने मन ही मन कहा—

"अगर मैं यहाँ पैदा हुई हूँ,

तो क्या मेरी किस्मत भी यहीं खत्म होनी चाहिए?"

हवा चली।

पेड़ों की सरसराहट जैसे जवाब दे रही हो—

"जो पहाड़ से लड़ जाता है,

वही मजबूत बनता है।"

एक नई खबर

अगले दिन स्कूल से लौटते समय

गाँव में हलचल थी।

लोग इकट्ठा थे।

कोई बाहर से आया था।

"कहते हैं लड़कियों के लिए कुछ शुरू करेगा।"

"शिक्षा से जुड़ा है।"

करिश्मा का दिल तेज़ धड़कने लगा।

उसे पहली बार लगा—

शायद पहाड़ भी कभी रास्ता खोलते हैं।

उम्मीद की पहली किरण

उस रात माँ ने खुद कहा—

"कल चलेंगे देखने…

क्या पता कुछ अच्छा हो।"

करिश्मा ने माँ को गले लगा लिया।

उसकी आँखों में आँसू थे,

पर ये आँसू डर के नहीं थे—

ये उम्मीद के थे।

अध्याय का अंत

उसने बाहर देखा—

पहाड़ अब भी वैसे ही थे,

पर उसे लगा

कुछ बदल रहा है।

शायद उसकी ज़िंदगी भी

इन पहाड़ों की तरह

अपनी ऊँचाई खुद तय करेगी।

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